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इंटरनेट कैसे काम करता है?, सिर्फ 2 प्रतिशत लोग जानते है

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How does the internet work ?, only 2 percent of people know इंटरनेट

क्या आपको पता है की सिर्फ 10 प्रतिशत जनसँख्या को इंटरनेट की परिभाषा के बारे में पता है और सिर्फ 2 प्रतिशत लोग जानते है की यह काम कैसे करता है? जब आप इस लेख को पढ़कर खत्म करेंगे तब आप भी उन कम लोगों में शामिल हो जायेंगे जिन्हे इंटरनेट के इस्तेमाल के बारे में पता है। हम शब्द इंटरनेट से शुरू करते है यह इंटरकनेक्टेड नेटवर्क यानी अलग अलग नेटवर्क को जोड़ता है।

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अलग अलग वैज्ञानिकों और इंजीनियर ने अलग अलग समय में इसमें अपनी भूमिका निभाई है। बिना किसी शक के टेलीफोन की खोज करने वाले ग्राहम बेल इस लिस्ट में सबसे ऊपर है।

यह कहते हुए हम आज के इंटरनेट के लिए शीत लड़ाई को इसका श्रेय देंगे।

1960 में अमेरिकी लोगों ने फैसला किया कि वह एक ही जगह पर सेना के लिए अपने कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करेंगे ताकि वह रूस के जेट का टारगेट नहीं बन सके।

फिर उन्होंने कंप्यूटर को देश के अलग अलग हिस्सों में भेजना शुरू किया।

अपने कम्प्यूटरों को बात करने के लिए टेलीफोन की लाइन के साथ जोड़कर एक नेटवर्क बनाया।

आपको याद है डायल करके कनेक्शन लेना, अब आपको इंटरनेट का इतिहास भी मालूम है।

अब असली बात करते है। इंटरनेट एक मेट्रो के ट्रैक की तरह है।

जिस पर ट्रेन या फिर सॉफ्टवेयर की भाषा में कहे तो पॉकेट फ्लो में दौड़ती है।

हम लोग उसके मुसाफिर यानि ग्राहक होते है। हम सीधे तौर से ट्रैक से जुड़े नहीं होते।

हम कभी रिक्शा, बस या फिर किसी और ढंग से ट्रैक के पास पहुंचने की कोशिश करते है।

यह सभी वाहन इंटरनेट सेवाएं है। इंटरनेट एक लम्बा चलने वाला ट्रैक है।

जो एक तार के जरिये चलता है और महासागर से गुजरते हुए अलग अलग महाद्वीपों को जोड़ता है। करीब 8 मिलीयन सर्विस जिन्हें डाटा सेंटर भी कहते हैं, इनसे जुड़े हुए है। सभी तारें, टेलीफोन, केबल टीवी और फाइबर ऑप्टिक तार पर निर्भर होती है।

हालाँकि अब हमें सेटेलाइट के जरिये भी इंटरनेट सेवा मिलती है।

हम दरअसल तारों में नहीं फास्ट और पृथ्वी पर कई होते है।

जैसे ही हम फेसबुक की साइट को वेब पर टाइप करते है तो हम सर्वर पर आदेश भेजते है।

यह आदेश हमारे इंटरनेट प्रोटोकॉल के साथ मिलता है।

फेसबुक एड्रेस अलग अलग श्रृंखला के नंबर बनाकर एक पैकेट बन जाता है और फिर तारों के जरिये जाते हुए फेसबुक के सिंगापुर सर्वर पर पहुँच जाता है।

वहाँ पर पड़ा कंप्यूटर उसे पढ़ता है और वेबपेज को पैकेट के नंबर में भेजता है।

जो हमारे कंप्यूटर पर दिखता है और इसी तरह इंटरनेट काम करता है।

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