बाप के बाद नौकरी पर विवाहित बेटी का भी हक – KhabarTak

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बाप के बाद नौकरी पर विवाहित बेटी का भी हक

पहले यह अधिकार सिर्फ अविवाहित पुत्रियों तक ही सीमित था. लेकिन पुत्रों के मामले में विवाह की कोई बाधा नहीं थी. लैंगिक समानता की खाई पाटने के मामले में अदालत के इस फैसले को मील का पत्थर माना जा रहा है. तमाम महिला संगठनों ने इस फैसले की सराहना की है.

क्या है मामला

बीरभूम जिले की पूर्णिमा दास ने वर्ष 2011 में अपने पिता हारूचंद्र दास की मौत के बाद अनुकंपा के आधार पर नौकरी की अर्जी दी थी. लेकिन सरकार ने यह कह उसकी अर्जी खारिज कर दी थी कि कानून में विवाहित पुत्रियों को नौकरी देने का कोई प्रावधान नहीं है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि हारूचंद्र को कोई पुत्र नहीं था. सिर्फ तीन पुत्रियां थीं. हारू की पत्नी और दोनों बड़ी बहनों ने लिख कर दे दिया था कि नौकरी छोटी बहन को दी जाए. बावजूद इसके सरकार ने विवाहित होने की दलील देते हुए उसकी अर्जी खारिज कर दी. वर्ष 2013 में पूर्णिमा ने हाई कोर्ट में अपील की थी. अदालत में सरकार की ओर से पंचायत और श्रम विभाग की ओर से वर्ष 2008 में जारी एक गजट अधिसूचना पेश की गयी जिसमें कहा गया था कि नौकरी में रहते पिता की मौत की स्थिति में सिर्फ अविवाहित पुत्रियां ही अनुकंपा के आधार पर नौकरी का आवेदन दे सकती हैं. लेकिन पूर्णिमा के वकील की दलील थी कि संविधान की धारा 14,15 और 16 के मुताबिक पुत्र और पुत्री में कोई भेदभाव नहीं है. ऐसे में अगर विवाहित पुत्र को नौकरी मिल सकती है तो विवाहित पुत्री के मामले में भेदभाव क्यों?

  • 10) बियाटे हाइस्टर

    बियाटे दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं की लिस्ट में दसवें नंबर पर हैं. वे जर्मनी के मशहूर सुपरमार्केट आल्डी की मालकिन हैं. उनके पास लगभग 13.6 अरब डॉलर की संपत्ति हैं.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    9) इरिस फॉन्टबोना

    चिली में खनन कंपनी की मालकिन इरिस फॉन्टबोना दुनिया की सबसे अमीर महिला की लिस्ट में 9वें स्थान पर हैं, इनकी कुल संपत्ति 13.7 अरब डॉलर है.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    8) अबीगैल जॉनसन

    अमेरिकी बिजनेस वूमन अबीगैल जॉनसन दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं की लिस्ट में 8वें स्थान पर आती है, इनकी कुल संपत्ति 14.4 अरब डॉलर है.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    7) जीना राइनहार्ट

    एक निजी खनन कंपनी की मालकिन जीना राइनहार्ट 15 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ ऑस्ट्रेलिया की सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं. दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में उनका स्थान सातवां है.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    6) लॉरेन पॉवेल जॉब्स

    इस लिस्ट में छठवें स्थान पर हैं. वे एप्पल इंक की को-फाउंडर और स्वीव जॉब्स की पत्नी हैं. इस वक्त वे 20 अरब डॉलर की मालकिन हैं.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    5) सुजैन क्लैटन

    दुनिया की सबसे अमीर महिला की लिस्ट में 5वें स्थान पर आती है, इनकी कुल संपत्ति 20.4 अरब डॉलर है. वे जर्मनी की सबसे अमीर महिला हैं.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    4) मारिया फ्रांका फिसेलो

    इटली की मारिया फ्रांका फिसेलो दुनिया की सबसे अमीर महिला की लिस्ट में 4 नंबर पर आती हैं, इनकी कुल संपत्ति 25.2 अरब डॉलर है. वे फेरेरो स्पा की मालकिन हैं, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी चॉकलेट निर्माता कंपनी है.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    3) जैक्विलिन मार्स

    इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर हैं. इस वक्त उनके पास लगभग 27 अरब डॉलर की संपत्ति है. वे फ्रैंक सी मार्स की पोती हैं, जिन्होंने फेमस चॉकलेट कंपनी मार्स बनाई थी.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    2) एलिस वॉल्टन

    फोर्ब्स की सबसे अमीर महिलाओं की लिस्ट में दूसरे नंबर पर एलिस वॉल्टन का नाम है. वे 33.8 अरब डॉलर की संपत्ति की मालकिन हैं. एलिस, वॉलमार्ट के फाउंडर सैम वॉल्टन की बेटी हैं.

  • ये हैं दुनिया की सबसे धनी महिलाएं

    1) लिलियाने बेटनकोर्ट

    2017 की दुनिया की सबसे अमीर महिला हैं. उनके पास लगभग 39.5 अरब डॉलर की संपत्ति हैं. लिलियाने मशहूर फ्रेंच कॉस्मेटिक कंपनी लॉरियल की प्रमुख शेयर होल्डर हैं.

लगभग चार साल तक चली सुनवाई के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश निशीथा म्हात्रे, न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति दीपकंर दत्त की खंडपीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि पुत्री के विवाह के बावजूद माता-पिता के साथ उसके संबंध खत्म नहीं होते. वह अपने माता-पिता के दिल में रहती है. अदालत ने इस बारे में सरकार की अधिसूचना को असंवैधानिक करार देते हुए उसमें जरूरी संशोधन का निर्देश दिया है. पूर्णिमा के अलावा नदिया जिले की अर्पिता सरकार और काकली चक्रवर्ती ने भी क्रमशः अपने पिता और माता की मौत के बाद उनकी जगह अनुकंपा के आधार पर नौकरी की याचिका ठुकराए जाने के बाद अदालत की शरण ली थी. हाई कोर्ट ने सरकार से अतीत में किये गये ऐसे तमाम आवेदनों पर भी दोबारा विचार करने को कहा है. पूर्णिमा के वकील अंजन भट्टाचार्य बताते हैं, “सरकार के समक्ष ऐसे कम से कम पांच हजार मामले विचाराधीन हैं. अब उन सबको उनका जायज हक मिलने का रास्ता साफ हो गया है.”

वैसे, पहले यह मामला हाई कोर्ट की एकल पीठ में था. वहां फैसला खिलाफ होने के बाद सरकार ने अपनी अधिसूचना का हवाला देते हुए नौकरी देने से मना कर दिया. उसके बाद फिर उसी न्यायाधीश की अदालत में मामला उठा था. वहां भी मुंह की खाने के बाद सरकार ने खंडपीठ में अपील की थी. लेकिन अब खंडपीठ ने अपने फैसले में सब कुछ साफ कर दिया है.

महिला संगठनों में खुशी

हाई कोर्ट के इस फैसले से महिला संगठनों में काफी प्रसन्नता है. उनकी दलील है कि इससे महिलाओं को न्याय मिलेगा. एक महिला संगठन की सचिव सुरभि चक्रवर्ती कहती हैं, “बंगाल में ऐसी हजारों महिलाएं हैं जो राज्य सरकार के इस भेदभावमूलक कानून की शिकार हो चुकी हैं. अब उनको न्याय मिलने की उम्मीद है.”

  • मिस्र में असल आजादी की जरूरत

    किताब शुरू होती है नवल ए सादावी के साथ जो डॉक्टर, लेखिका और महिला अधिकारों की जानी मानी पैरोकार हैं. मध्य पूर्व की महिलाएं अपनी लड़ाई में बड़ा मुकाम हासिल करने में अब तक क्यों नाकाम रही हैं, इस पर वो कहती हैं, “जो पितृसत्तात्मक, साम्राज्यवादी और सैन्य तंत्र हमारी जिंदगी को तय करता है उसमें महिलाओं को आजादी नहीं मिल सकती. हम पर ताकत और झूठे लोकतंत्र से शासन होता है, न्याय और असल आजादी से नहीं.”

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    निर्वासन झेलती सीरियाई मनोविश्लेषक

    सीरियाई मनोविश्लेषक राफाह नाशेद को भयभीत असद विरोधी प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए बैठक बुलाने के बाद सितंबर 2011 में दमिश्क से गिरफ्तार किया गया. दो महीने बाद उन्हें आजाद तो कर दिया गया लेकिन अब वह पेरिस में निर्वासित जिंदगी जी रही हैं. हुईफेल्ड्ट की किताब में वह कहती हैं, “अरब समाज में बदलाव को इंकार किया जाता है क्योंकि जो भीड़ का हिस्सा नहीं है उसे नास्तिक या असामान्य मान लिया जाता है.”

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    लोगों की इच्छा है लोकतंत्र

    ईरानी वकील शिरीन एबादी ने अपना जीवन महिलाओं, बच्चों और शरणार्थियों के अधिकारों की लड़ाई में लगा दिया है. अपने देश में वो सरकार और पुलिस के लिए खतरा मानी जाती हैं. 2003 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला. वह कहती हैं, “लोकतंत्र पूर्व और पश्चिम को नहीं जानता, लोकतंत्र लोगों की इच्छा है. इसलिए मैं लोकतंत्र के अलग अलग मॉडल को नहीं मानती.”

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    इस्राएल और फलस्तीन के बीच शांति

    “निश्चित रूप से कब्जा जो है वो पुरुषों का है खासतौर से सैन्य कब्जा. इस्राएल और फलस्तीन के बीच जो विवाद है वह पुरूषों का बनाया है और हम महिलाओं को इसे खत्म करना है,” यह कहना है फलस्तीनी सांसद, कार्यकर्ता और विद्वान हन्नान अशरावी का. यहूदी शरणार्थियों के बारे में कुछ विवादित बयान देने के बावजूद अशरावी ने इस्राएल और फलस्तीन के बीच शांति के लिए अहम योगदान दिया है.

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    यमन में महिलाओं से डरते पुरूष

    महिला अधिकारों की पैरोकार अमाल बाशा यमन की हैं. उनके देश को 2016 में संयुक्त राष्ट्र के लैंगिक समानता सूचकांक में सबसे नीचे रखा गया था. वह कहती हैं कि महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर शरिया कानून के जरिए रोक लगायी जाती है, लेकिन क्यों? उनका कहना है, “पुरूष डरते हैं क्योंकि महिलाएं शांति की आवाज हैं. उनकी जंग में कोई दिलचस्पी नहीं.”

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    लीबिया में शांति की उम्मीद

    लीबिया की हाजर शरीफ संयुक्त राष्ट्र की सलाहकार समिति और कोफी अन्नान फाउंडेशन की सदस्य हैं. वह कहती हैं कि लीबिया में गृह युद्ध को खत्म करने के लिए महिला पुरूष, दोनों को अपना रवैया बदलना होगा. उनका कहना है, “अगर आप घरों पर नज़र डालेंगे तो मांएं अपने बेटों को जंग में भेजती दिखेंगीं. अगर वे खुद हथियार लेकर नहीं चल रहीं तो भी निश्चित रूप से वे लीबिया में जो हिंसा का चक्र है उसमें योगदान दे रही हैं.”

  • मुस्लिम महिला होने का मतलब

    जॉर्डन में इज्जत के नाम पर हत्या

    जॉर्डन की राना हुसैनी एक महिला अधिकारवादी ,मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और एक खोजी पत्रकार भी हैं, जिनकी रिपोर्टों ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर रोशनी डाली है. इज्जत के नाम पर हत्या के बारे में उनका कहना है, “जॉर्डन का समाज हर चीज के लिए महिलाओं को जिम्मेदार बताता है, बलात्कार के लिए, उत्पीड़न के लिए, लड़कियों को जन्म देने के लिए और यहां तक कि पुरूषों के व्यभिचार और धोखेबाजी के लिए भी.”

महिला अधिकार कार्यकर्ता देवस्मिता गोस्वामी कहती हैं कि राज्य के आम परिवारों में बेटे और बेटी में भेदभाव नहीं किया जाता. उल्टे यहां बेटियों को ही परिवार में ज्यादा इज्जत मिलती है. लेकिन सरकार ने राज्य की परंपराओं और संस्कृति के उलट लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाला कानून बनाया था. वह कहती हैं कि इस कानून की वजह से ऐसे मामलों में महिलाएं अपने जायज हक से वंचित रह जाती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.

दूसरी ओर, सरकार ने कहा है कि वह अदालत का विस्तृत फैसला पढ़ने के बाद ही कोई टिप्पणी करेगी. श्रम मंत्री मलय घटक कहते हैं, “अभी फैसले की प्रति नहीं मिली है. फैसले को विस्तार से पढ़ने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला किया जाएगा.” सरकार ने भले फिलहाल इस पर चुप्पी साध रखी हो, लेकिन महिला संगठनों का कहना है कि लैंगिक भेदभाव खत्म करने में अदालत का यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा.

Via DW (हिन्दी)

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