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आखिर क्यों पूजा के बाद की जाती है आरती..!!!जानिए इसके पीछे का कारण..!!!

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हिन्दू धर्म का एक सामान्य नियम है चाहे कोई भी जगह हो घर हो या मंदिर या कोई धार्मिक स्थान या कहीं धार्मिक कार्यक्रम हो रहा हो तो भगवान की पूजा के बाद आरती की जाती है। बिना आरती के कोई भी पूजा पूरी नहीं होती है। जब भी किसी देवी देवता की पूजा होती है चाहे वह भगवान विष्णु की हो या लक्ष्मी की अथवा शिव पार्वती की हर पूजा के बाद या यूं कहें कि पूजा समापन आरती के साथ होता है।

स्कंद पुराण में बताया गया है आरती करना महत्वपूर्ण क्यों होता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।आरती का अर्थ होता है व्याकुल होकर भगवान को याद करना, उनका स्तवन करना।

आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। आरती में देवी-देवताओं का नाम का गुणगान और उनका ध्यान किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि आरती में जो धंद और लय के साथ जो गायन विधि से देवी-देवताओं का ध्यान किया जाता है उससे संबंधित देवता प्रसन्न होते हैं।

लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण के अलावा वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी यह बताता है कि आरती करना बड़ा ही फायदेमंद होता है। और सबसे खास बात है आरती में प्रयोग होने वाली सामग्री और आरती का तरीका।

आरती में प्रयोग होने वाली सामग्री जैसे रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन आदि सबका मह्त्व होता है । रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है।जब रुई के
साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।

हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है,इसलिए पूजा के बाद आरती की जाती है ।

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